बस्तर के बदलते चेहरे से रूबरू हुए दिल्ली के 43 इंफ्लुएंसर्स, सुकमा से पूवर्ती तक देखा बदलाव

रायपुर, 30 सितंबर 2026। बस्तर को लंबे समय तक नक्सल हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन अब यहां बदलाव की तस्वीर भी सामने आ रही है। दिल्ली से आए 43 इंफ्लुएंसर्स ने अपने बस्तर भ्रमण के दूसरे दिन सुकमा से जगरगुंडा, केरलापेंदा होते हुए पूवर्ती तक करीब 13 घंटे से अधिक की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने पुनर्वास केंद्र, सुरक्षा व्यवस्था, ग्रामीण जीवन, शहीद जवानों से जुड़ी स्मृतियों और वर्षों बाद दोबारा खुले श्रीराम मंदिर को करीब से देखा।
पुनर्वास केंद्र में पूर्व नक्सलियों से संवाद
यात्रा की शुरुआत सुकमा के पुनर्वास केंद्र से हुई। यहां इंफ्लुएंसर्स ने हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। उन्होंने आत्मसमर्पण के बाद उनके जीवन में आए बदलाव और सामान्य जीवन की ओर लौटने के अनुभवों को समझा।
इसके बाद दल ने सुकमा के पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर क्षेत्र में सुरक्षा, शांति, विकास और प्रशासनिक पहुंच से जुड़े प्रयासों की जानकारी ली। सुकमा के साइंस पार्क का भ्रमण कर उन्होंने बस्तर में शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं से जुड़ी गतिविधियों को भी देखा।
‘खूनी सड़क’ से जगरगुंडा तक पहुंचे
तोंगपाल में भोजन के बाद दल जगरगुंडा की ओर रवाना हुआ। इस दौरान इंफ्लुएंसर्स उस मार्ग से गुजरे, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘खूनी सड़क’ के नाम से जाना जाता है। जगरगुंडा पहुंचकर उन्हें 6 अप्रैल 2010 के ताड़मेटला हमले और उसमें शहीद हुए 76 सीआरपीएफ जवानों से जुड़ी जानकारी दी गई।
यहां उन्होंने बस्तर के उस दौर को समझा, जब क्षेत्र नक्सली हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावित था।
21 साल बाद खुले श्रीराम मंदिर को देखा
जगरगुंडा के बाद दल केरलापेंदा पहुंचा। यहां ग्रामीणों से बातचीत के साथ उन्होंने वर्षों तक बंद रहे श्रीराम मंदिर का भी भ्रमण किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, माओवादी प्रभाव के दौर में वर्ष 2003 से मंदिर में पूजा-अर्चना बंद थी। करीब 21 साल बाद अप्रैल 2024 में सुरक्षा बलों और ग्रामीणों के सहयोग से मंदिर की सफाई कर पूजा दोबारा शुरू की गई।
मंदिर में भगवान श्रीराम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण की संगमरमर की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इंफ्लुएंसर्स ने मंदिर से जुड़े इतिहास और ग्रामीणों के अनुभवों को जाना।
पूवर्ती में हिडमा के परिवार से मुलाकात
इसके बाद दल कई घंटे की यात्रा कर पूवर्ती पहुंचा। यह नक्सली कमांडर हिडमा का पैतृक गांव है। यहां इंफ्लुएंसर्स ने उसके बड़े भाई, भाभी और भतीजे से बातचीत की। उन्होंने गांव की वर्तमान परिस्थितियों, स्थानीय जीवन और क्षेत्र में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली।
इस मुलाकात ने इंफ्लुएंसर्स को बस्तर की सामाजिक परिस्थितियों को एक अलग नजरिए से समझने का अवसर दिया।
अतीत और वर्तमान की तस्वीर एक साथ
सुकमा पुनर्वास केंद्र से लेकर जगरगुंडा की शहादत की स्मृतियों, केरलापेंदा के ग्रामीण संवाद और दोबारा खुले श्रीराम मंदिर से होते हुए पूवर्ती तक की यात्रा में इंफ्लुएंसर्स ने बस्तर के अतीत और वर्तमान दोनों को करीब से देखा।
रात करीब 11 बजे दंतेवाड़ा पहुंचने तक उनके सामने बस्तर की कई तस्वीरें थीं—हिंसा से प्रभावित अतीत, आत्मसमर्पण के बाद सामान्य जीवन की ओर लौटते लोग, सुरक्षा और विकास की गतिविधियां, ग्रामीणों के अनुभव और वर्षों बाद फिर शुरू हुई धार्मिक गतिविधियां। यह यात्रा बस्तर को केवल संघर्ष के नजरिए से नहीं, बल्कि वहां हो रहे सामाजिक बदलावों के संदर्भ में देखने का अवसर बनी।



