
मैनपुर। गरियाबंद जिले के मैनपुर मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर राजापड़ाव क्षेत्र का ग्राम भालूपानी इन दिनों विकास के दावों पर सवाल खड़ा कर रहा है। पंचायत भूतबेड़ा के इस गांव में पिछले तीन महीनों से सौर ऊर्जा व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ी है। नतीजा यह है कि करीब 25 परिवारों के 230 आदिवासी ग्रामीण हर शाम अंधेरे के बीच जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।सूरज ढलते ही गांव की तस्वीर बदल जाती है। शाम होते ही गलियों में अंधेरा छा जाता है। एक ओर घने जंगल और वन्यजीवों का खतरा, तो दूसरी ओर घरों में सांप-बिच्छुओं के घुसने का डर ग्रामीणों की चिंता बढ़ा रहा है। ऐसे में रात का समय ग्रामीणों के लिए सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का सवाल बन गया है।
अंधेरे ने बच्चों की पढ़ाई पर लगाया ब्रेक बिजली की व्यवस्था बंद होने का सबसे ज्यादा असर गांव के बच्चों पर पड़ रहा है। शाम के बाद पढ़ाई करना मुश्किल हो गया है। मोबाइल चार्ज करने तक की सुविधा नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ जाए या रात में कोई आपात स्थिति पैदा हो जाए तो मदद मिलने तक इंतजार करना पड़ता है।महिलाओं को भी रोजमर्रा के कामकाज में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, अंधेरे में घर से बाहर निकलना तक जोखिम भरा हो जाता है।
शिकायत के बाद भी समाधान नहीं ग्रामीणों का आरोप है कि सौर ऊर्जा व्यवस्था खराब होने की शिकायत कई बार संबंधित विभाग तक पहुंचाई गई, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। उनका कहना है कि कभी-कभार कर्मचारी या मिस्त्री पहुंचते हैं, निरीक्षण करते हैं और चले जाते हैं, लेकिन गांव में रोशनी वापस नहीं लौटती।ग्रामीणों का सवाल है कि यदि व्यवस्था महीनों से बंद है तो इसकी मरम्मत आखिर कब होगी? क्या दूरस्थ वनांचल में रहने वाले लोगों की समस्याओं को इसलिए नजरअंदाज किया जा रहा है क्योंकि उनकी आवाज प्रशासनिक दफ्तरों तक आसानी से नहीं पहुंचती?
ग्रामीणों ने कलेक्टर से लगाई गुहार लगातार अंधेरे से परेशान ग्रामीणों ने अब जिला प्रशासन का दरवाजा खटखटाया है। ग्राम पंचायत भूतबेड़ा की सरपंच श्रीमती दुखियाबाई मरकाम, उप सरपंच श्रीमती साधना बाई नेताम, प्रतिनिधि टीकम मरकाम, भीखऊ राम नेताम, अर्जुन सिंह मरकाम, अंगद राम नेताम, धनसाय नेताम और कवडू राम नेताम सहित ग्रामीणों ने कलेक्टर गरियाबंद से सौर ऊर्जा व्यवस्था की तत्काल मरम्मत कराने की मांग की है।ग्रामीणों की मांग साफ है—उन्हें आश्वासन नहीं, रोशनी चाहिए।
बड़ा सवाल: आखिर कब पहुंचेगा विकास का उजाला? सरकार दूरस्थ गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने और वनांचल क्षेत्रों के विकास के दावे करती है। लेकिन भालूपानी की स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े करती है।
तीन महीने से बंद सौर ऊर्जा व्यवस्था क्या सिर्फ एक तकनीकी खराबी है या फिर दूरस्थ आदिवासी गांवों की उपेक्षा की तस्वीर?क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जा रहा है?क्या संबंधित विभाग गांव की समस्या का स्थायी समाधान करेगा?और सबसे बड़ा सवाल—क्या विकास की रोशनी भालूपानी तक पहुंचने में अभी और कितना समय लगेगा?ग्रामीणों की उम्मीद अब जिला प्रशासन से है कि इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर खराब सौर ऊर्जा व्यवस्था को दुरुस्त कराया जाएगा, ताकि जंगल के बीच बसे इस गांव में फिर से रोशनी लौट सके।




