Follow Us on Our Social Media
छत्तीसगढ़
Trending

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को बस्तर दशहरा का न्योता, 75 दिनों तक चलेगा आस्था का महापर्व

बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने की मुलाकात, पारंपरिक पागा पहनाकर किया सम्मान

Follow Us on Our Social Media

रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व 2026 में शामिल होने का आमंत्रण दिया गया है। गुरुवार शाम राजधानी रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में बस्तर सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में बस्तर दशहरा समिति, जगदलपुर के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से सौजन्य मुलाकात की।

इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें पर्व में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित किया और बस्तर की जनजातीय परंपरा के अनुरूप पारंपरिक पागा पहनाकर सम्मानित किया।

मुख्यमंत्री साय ने आमंत्रण के लिए प्रतिनिधिमंडल का आभार जताते हुए बस्तर दशहरा के सफल आयोजन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, समृद्ध जनजातीय संस्कृति और सामूहिक सहभागिता की अनमोल विरासत है।

यह आयोजन बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक समरसता को दर्शाता है। राज्य सरकार बस्तर की सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय परंपराओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध है।

75 दिनों तक चलती है परंपरा और आस्था की यात्रा

प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, धार्मिक अनुष्ठानों और इस वर्ष की तैयारियों की जानकारी दी। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह विशिष्ट पर्व हरेली अमावस्या से शुरू होकर आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तक विभिन्न पूजा-विधानों और अनुष्ठानों के साथ चलता है।

इस वर्ष 12 अगस्त को पाटजात्रा पूजा विधान के साथ पर्व का शुभारंभ हुआ। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा, 18 अक्टूबर को बेल पूजा और 23 अक्टूबर को मुरिया दरबार का आयोजन किया जाएगा। पर्व के विभिन्न अनुष्ठानों में बस्तर अंचल के अलग-अलग समुदायों की महत्वपूर्ण भागीदारी रहती है।

रावण दहन नहीं, मां दंतेश्वरी की आराधना है मुख्य विशेषता

बस्तर दशहरा देश के अन्य दशहरा आयोजनों से अपनी विशिष्ट परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है। यहां दशहरा भगवान श्रीराम की रावण पर विजय के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के महापर्व के रूप में मनाया जाता है।

इस पर्व की ऐतिहासिक परंपरा चालुक्य नरेश पुरुषोत्तम देव से भी जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की यात्रा के दौरान उन्हें ‘रथपति’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। इसी परंपरा के चलते बस्तर दशहरा में रथ का विशेष महत्व है।

जनजातीय समुदायों की भागीदारी है पर्व की पहचान

बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसके धार्मिक अनुष्ठानों, रथ निर्माण और आयोजन की व्यवस्थाओं में मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन सहित विभिन्न समुदायों की परंपरागत भूमिका रहती है। पीढ़ियों से चली आ रही यह सामूहिक सहभागिता पर्व को सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समन्वय का अनूठा उदाहरण बनाती है।

भव्य रथयात्रा, विशिष्ट पूजा-विधान और जीवंत लोक संस्कृति के कारण बस्तर दशहरा देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह आयोजन न केवल बस्तर की ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाता है, बल्कि स्थानीय कला, संस्कृति और पर्यटन को भी पहचान दिलाता है।

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर की संस्कृति पूरे छत्तीसगढ़ की अमूल्य धरोहर है। ऐसी परंपराएं लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराती हैं। इनका संरक्षण और देश-दुनिया तक प्रचार-प्रसार करना सभी की साझा जिम्मेदारी है।

मुख्यमंत्री को आमंत्रित करने पहुंचे प्रतिनिधिमंडल में सांसद महेश कश्यप के साथ मंगलु मांझी, बलराम मांझी, पदम् चालकी, समारू चालकी, डमरू चालकी, लक्ष्मण मांझी सहित अनेक मांझी, चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन और बस्तर दशहरा समिति के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

mahipal sao

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा पूर्ण की। इसके पश्चात पत्रकारिता के क्षेत्र में करियर… More »

Related Articles

Back to top button