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दूसरे को बुरा बताकर खुद अच्छे बन जाओ

महिपाल साव

हर कोई अच्छा बनना चाहता है क्योंकि जो अच्छा होता है, उसकी सब तारीफ करते हैं। उसे उदाहरण की तरह पेश करते हैं।उसका नाम लेकर कहा जाता है कि अच्छा बनना है तो उसके समान बनो।वह देखों कितना अच्छा है,वह घूस नहीं लेता है।वह देखो, वह कितना अच्छा है बेईमानी नहीं करता है। वह देखों, वह कितना अच्छा है कभी झूठ नहींं बोलता।इस तरह अच्छा बनने में बहुत समय लगता है।क्योंकि अच्छा बनने के लिए बरसों निरंतर अच्छा बने रहना पड़ता है। लोग तो मौके की ताक में रहते हैं कि कब यह घूस ले और मैं इसे कहूं कि अब यह अच्छा नहीं रहा। कब यह बेईमानी करे और मैं कहूं कि यह ईमानदार नहीं रहा।कब यह झूठ बाेले और मैं कहूं कि यह अब झूठ बोलता है यह अच्छा नहीं रहा। कहते हैं न कि शिखर पर पहुंचने मेंं बहुत मेहनत करनी पड़ती है, शिखर पर पहुंचने पर पता चलता है कि शिखर पर बने रहने में उससे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। अच्छा बनने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है लेकिन अच्छा बने रहने के लिए उससे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यह अच्छा बनने का सकारात्मक तरीका है।यह तरीका कठिन होता है इसलिए बहुत कम लोग इस तरीके से अच्छा बनते हैं

अच्छा बनने का एक दूसरा तरीका भी होता है, जिसे नकारात्मक तरीका कहा जाता है।यह तरीका सरल होता है,बहुत कम समय लगता है इसलिए ज्यादातर लोग अच्छा बनने के लिए इस तरीके का उपयोग करते हैं और जल्दी अच्छा बन जाते है।इसमें कुछ नहीं करना होता है।किसी ने कुछ किया है या कहा है तो उसको बुरा बता दो।इधर आपने बुरा कहा और उधर आप अच्छे बन गए। सब आपकी वाहवाही करेंगे कि देखो कितना अच्छा आदमी है, इसने उसके किए काम को बुरा कहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के दुष्कर्म मामले में दिए एक फैसले में की गई टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए उन्हें असंवेनशील व अमानवीय करार दिया।उन पर रोक लगा दी।अब सब हाईकोर्ट के जज की इस टिप्पणी के लिए आलोचना कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सब सराहना कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने किया क्या हाईकोर्ट के फैसले की गलत बताकर रोक दिया।हाईकोर्ट के फैसले को बुरा बताकर सुप्रीम कोर्ट अच्छा बन गया।ऐसा भी नहीं है कि हाईकोर्ट के जज ने जल्दी में अपने फैसले में ऐसी टिप्पणी कर दी थी।राष्ट्रीय महिला आयोग ने इस काम के लिए सुप्रीम कोर्ट की तारीफ की है।महिला संगठन भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तारीफ कर रही हैं। अदालत में महिलाओं के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी कोई पहली बार नहीं की गई है।२०२३ में कोलकाता हाईकोर्ट ने यौन हमले के मामले में आपत्तिजनक टिप्पणी की थी कि किशोरवय लड़़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए,हाईकोर्ट की इस टिप्पणी की भी काफी आलोचना हुई थी।तब भी सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जज से कहा था कि अदालती फैसलाें में विभिन्न विषयों पर जज की निजी राय शामिल नहीं होनी चाहिए।

हमारे देश में न्यायालय से हमेशा कानून सम्मत टिप्पणी की अपेक्षा की जाती है।जिस देश में महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध के आंकड़े डरानेवाले हो.उस देश में किसी हाईकोर्ट से देश अमानवीय टिप्पणी की उम्मीद नहीं करता है।हाई कोर्ट की ऐसी टिप्पणी को बुरा बताकर, उस पर रोक लगाकर सुप्रीम कोर्ट तो जनता की नजर में अच्छा बन जाता है, उसका काम यह नहीं है कि हाईकोर्ट की टिप्पणी को बुरा बताकर वह अच्छा बन जाए और तारीफ बटोरे। उसका काम तो है कि ऐसी व्यवस्था बनाना कि कोई भी निचली अदालत इस तरह की टिप्पणी ही न कर सके। सुप्रीम कोर्ट की आलोचना भी इस बात के लिए की जा सकती है कि वह हाईकोर्ट के जजों को सुधार नहीं पा रहा है।

हाईकोर्ट के जजों से गलती हो रही है और सुप्रीम कोर्ट गलती बताकर खुद तो अच्छा तो बन जाता है और हाईकोर्ट बुरे के बुरे बने रहते हैं, वही गलती बार बार करते रहते हैं।राजनीति के क्षेत्र में व संसद में हाल और बुरा है।इसका उदाहरण राजनीति में भी देखने को मिलता है और संसद में भी देखने को मिला है।न्याय क्षेत्र में तो हाईकोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट की सुन लेते है, गलती मान लेते हैं लेकिन संसद में लोकसभा अध्यक्ष किसी को कहते हैं या सभी संसद सदस्यों से कहते हैं कि वह नियमों व सदन की मर्यादा के अनरूप आचरण नहीं कर रहे हैं तो एक सांसद संसद के बाहर आकर कहते हैं कि लोकसभा अध्यक्ष सदन को अलोकतांत्रिक तरीके से चला रहे हैं। विपक्ष को बोलने का मौका नहीं देते हैं।सत्ता पक्ष को बोलने का ज्यादा मौका दिया जाता है।उदाहरण दिया जाता है कि जब सुषमा स्वराज्य नेता प्रतिपक्ष थी तो लोकसभा में उनको कितना सम्मान मिलता था।

विपक्ष चाहता है कि नेता प्रतिपक्ष को सुषमा स्वराज्य के समान सम्मान मिले तो यह भी देखना चाहिए कि क्या नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज्य के समान आचरण संसद में करते हैं क्या। सुषमा स्वराज्य ने तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पर आरोप नहीं लगाया था कि वह अलोकतांत्रिक ढंग से संसद चला रहे हैं। आज तो लोकसभा अध्यक्ष से कहा जा रहा है आप को संसद चलाना नहींं आता है। लोकसभा अध्यक्ष किसी को अब कह भी नहीं सकते कि आप नियमों मर्यादा का पालन नहीं कर रहे हो। कोई भी संसद सदस्य कह सकता है कि आपको संसद चलाना नहीं आता है। लोकसभा अध्यक्ष हर सांसद से यही तो कह रहे हैं कि वह संसद में नियमों व मर्यादा के अऩुसार आचरण करे, अच्छा आचरण करे।

सासंदों का मानना चाहिए कि लोकसभा अध्यक्ष ठीक कह रहे है।उनको नियम, कायदा,परंपरा का हमसे ज्यादा जानकारी है लेकिन यहां तो उल्टा हो रहा है अब तो सासंद लोकसभा अध्यक्ष को बता रहे हैं कि आपको कुछ पता नहीं है,हमको आप से ज्यादा पता है। आप संसद को ठीक नहीं चला रहे हैं। हमारा आचरण गलत नहीं है आपका आचरण गलत है। यह होता है नकारात्मक तरीके से खुद को दूसरे से अच्छा बताना। कोई आपकी एक गलती बताए तो आप उसकी दो गलती बताओ। कोई गलती बताए तो यह तो मानना नहीं है कि मैं गलत हो सकता हूं, कोई गलती बताए तो आज उससे कहा जा रहा है कि आप ज्यादा गलत हो। ऐसा करके वह खुद को दूसरे से अच्छा बताने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन इससे कोई अच्छा बन नहीं जाता है।इससे उसका अहंकार ही सामने आता है कि मैं गलत हो ही नहीं सकता। तुम मुझे गलत कैसे कह सकते हो।

छत्तीसगढ़ में भी ऐसा ही हो रहा है। सीबीआई महादेव सट्टा एप मामले में छापा मार रही है तो छापे को गलत बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि महादेव सट्टा एप मामले में हमने तो किसी को संरक्षण नहीं दिया हमने तो उनके खिलाफ कार्रवाई की थी। जनता के मन में इससे सवाल पैदा होता है कि जब कार्रवाई की थी तो सट्टा राज्य में चला कैसे। जनता तो जानती है कि सट्टा तो संरक्षण में ही चलता है, सट्टा तो कार्रवाई होने से चलता नहीं है। सट्टा कई बरस चला है तो साफ है कि संरक्षण दिया गया है, संरक्षण दिया गया है तो बदले में पैसा भी लिया गया है। पैसा लेने वाले कार्रवाई नहीं करते हैं।

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