नेताजी की सुई’ का खौफ: अमलीपदर में 8 दिन में दूसरी मौत, स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप
पहले डिगने और अब अभिलाष की मौत के बाद निजी क्लीनिकों पर उठे गंभीर सवाल

गरियाबंद। जिला मुख्यालय से दूर अमलीपदर क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम की लाचारी और निजी इलाज के नाम पर चल रहे ‘खेल’ ने महज आठ दिनों के भीतर दो ग्रामीणों की जान ले ली है। सराईपानी के डिगने यादव की संदिग्ध मौत का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि सरना बहाल (कुर्लापारा) निवासी 55 वर्षीय अभिलाष नेताम की मौत ने पूरे इलाके में आक्रोश और दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। इन दोनों मामलों के केंद्र में अमलीपदर का एक निजी इलाज और वहां दिए जा रहे हाई-डोज इंजेक्शन हैं।
इंजेक्शन का डोज खत्म होते ही उखड़ने लगी सांसें
परिजनों से मिली जानकारी के मुताबिक, अभिलाष नेताम की तबीयत खराब होने पर उन्हें अमलीपदर के डॉ. मनीष सिन्हा के पास ले जाया गया था। आरोप है कि इलाज के दौरान उन्हें एक के बाद एक तीन एंटी-मलेरियल (मलेरिया-रोधी) इंजेक्शन लगाए गए। 14 सितंबर की रात करीब 8:40 बजे जैसे ही इंजेक्शन का आखिरी डोज पूरा हुआ, अभिलाष की स्थिति अचानक बिगड़ने लगी और उन्हें सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी।
उरमाल से देवभोग तक ‘रेफरल यात्रा’ और घर में दम तोड़ा
मरीज की हालत बिगड़ते देख परिजन उन्हें तत्काल शासकीय उरमाल स्वास्थ्य केंद्र लेकर भागे। वहां ड्यूटी डॉक्टर ने स्थिति को नाजुक देखते हुए तुरंत हायर सेंटर रेफर कर दिया। इसके बाद शुरू हुई एक लंबी और थका देने वाली ‘रेफरल यात्रा’। बेसुध मरीज को लेकर परिजन उरमाल से ओडिशा के धर्मगढ़ और फिर वहां से देवभोग अस्पताल दौड़े। देवभोग में थोड़ी राहत दिखने पर परिजन उन्हें वापस घर ले आए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बुधवार दोपहर करीब 1 बजे सरना बहाल स्थित गृहग्राम में अभिलाष ने दम तोड़ दिया।
सबसे बड़ा सबूत: रेफरल पर्ची में दर्ज है ‘तीन इंजेक्शन’ की दास्तान
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला और पुख्ता दस्तावेज मरीज की रेफरल पर्ची है। सूत्रों के मुताबिक, इस आधिकारिक सरकारी पर्ची के केस हिस्ट्री कॉलम में साफ तौर पर दर्ज है कि मरीज को डॉ. सिन्हा द्वारा तीन एंटी-मलेरियल इंजेक्शन दिए गए थे। अब यह गंभीर चिकित्सकीय जांच का विषय है कि:
किस पैथोलॉजी रिपोर्ट या जांच के आधार पर एक साथ तीन हैवी इंजेक्शन दिए गए?
क्या इन दवाओं का ओवरडोज या रिएक्शन ही मरीज की सांसें उखड़ने की वजह बना?
क्या निजी क्लीनिक संचालक के पास इन दवाओं को देने की वैध पात्रता और योग्यता है?
8 दिन, 2 मौतें: संयोग या बड़ी लापरवाही?
पीड़ित का नामनिवासीइलाज का स्थानपरिजनों का आरोपवर्तमान स्थितिडिगने यादवसराईपानीनिजी क्लीनिक, अमलीपदरआर्टीसुनेट इंजेक्शन के बाद तबीयत बिगड़ीजांच समिति गठित, रिपोर्ट लंबितअभिलाष नेतामसरना बहालडॉ. मनीष सिन्हा (निजी), अमलीपदरतीन एंटी-मलेरियल इंजेक्शन के बाद सांस रुकीबुधवार को मौत, हड़कंप
रसूख की छांव में कब तक दबेगी जांच?
इलाके में चर्चा है कि इलाज करने वाले डॉक्टर का संबंध एक रसूखदार राजनीतिक दल से है, जिसके चलते स्वास्थ्य विभाग के जमीनी अधिकारी मामलों को दबाने का प्रयास करते रहे हैं। हालांकि, किसी का राजनीतिक दल से जुड़ना अपराध नहीं है, लेकिन जब मामला इंसानी जान से जुड़ा हो, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजिमी है। डिगने यादव की मौत के बाद विभाग ने जांच कमेटी तो बनाई, लेकिन उसकी कछुआ चाल ने सिस्टम की मंशा पर पानी फेर दिया। अब अभिलाष की मौत के बाद क्या दोनों मामलों के मेडिकल रिकॉर्ड को एक साथ रखकर उच्च स्तरीय जांच होगी?
बुनियादी सवाल: डॉक्टर नहीं तो ग्रामीण जाएं कहां?
इस पूरी त्रासदी का सबसे स्याह पहलू यह है कि अमलीपदर क्षेत्र के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और मूलभूत सुविधाओं का सालों से अकाल है। जब सरकारी चौखट पर इलाज नहीं मिलता, तो गरीब ग्रामीण मजबूरी में इन निजी क्लीनिकों का रुख करते हैं। अब देखना यह है कि गरियाबंद स्वास्थ्य विभाग इस बार भी मामले को फाइलों में दफन करता है या कोई ठोस कार्रवाई कर पीड़ितों को न्याय दिलाता है।



