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मैनपुर जनपद पंचायत में ‘सीक्रेट’ बैठक! बंद दरवाजों के पीछे जनता के पैसे का ‘घालमेल’ या विकास?

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तरुण नागेश / गरियाबंद लोकतंत्र में पत्रकार को जनता की आंख और कान माना जाता है। जो बात आम आदमी तक नहीं पहुंचती, उसे सामने लाने का काम मीडिया का है। लेकिन क्या हो जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और अधिकारी विकास की योजनाएं बनाने के बजाय खुद को एक कमरे में कैद कर लें? मैनपुर जनपद पंचायत की सामान्य सभा की बैठक ने कुछ ऐसे ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या बंद कमरे में विकास का खाका खींचा जा रहा था, या फिर योजनाओं में ‘गोटी मारने’ और भ्रष्टाचार की कोई नई पटकथा लिखी जा रही थी?

सिर्फ 7 अधिकारी पहुंचे, 26 का अता-पता नहीं

बैठक का मजाक इस हद तक उड़ गया कि जिन 33 विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को वहां मौजूद रहना अनिवार्य था, उनमें से केवल 7 ने ही अपनी शक्ल दिखाई। बाकी 26 विभागों के अधिकारी गायब रहे। क्या इन अधिकारियों को ब्लॉक के विकास से कोई मतलब नहीं है? या फिर उन्हें पता था कि अंदर क्या होने वाला है?

आंगनबाड़ी भर्ती पर फूटा जन प्रतिनिधियों का गुस्सा

बंद दरवाजे के पीछे की कहानी तब बाहर आई जब बैठक में भारी गहमागहमी और तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। सबसे ज्यादा बवाल आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के पदों पर हो रही नियुक्तियों को लेकर हुआ। जनपद सदस्यों ने अधिकारियों पर मनमानी का आरोप लगाते हुए जमकर आवाज उठाई।

कलेक्टर से की गई ‘कारण बताओ’ नोटिस की मांग

जनपद क्षेत्र क्रमांक 17 के सदस्य योगीराज माखन कश्यप ने इस तानाशाही रवैये पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कलेक्टर को अपील भेजकर अनुपस्थित अधिकारियों को लिखित ‘कारण बताओ’ नोटिस जारी करने की मांग की है। उन्होंने खुलासा किया कि पिछले महीने भी बैठक नहीं हो पाई थी, फिर भी अधिकारियों के कान पर जूं नहीं रेंगी। इस मांग का समर्थन करते हुए क्षेत्र क्रमांक 11 के सदस्य परमेश्वर जैन ने भी अधिकारियों की इस लापरवाही को रिकॉर्ड में दर्ज कराने की पुरजोर मांग की।

मीडिया से क्यों भागे जनपद CEO डी.एस. नागवंशी?

इस पूरे मामले को सबसे ज्यादा संदिग्ध बनाया है जनपद के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) डी.एस. नागवंशी के रवैये ने। सूत्रों के मुताबिक, उन्हीं के इशारे पर बैठक का दरवाजा बंद किया गया था। जब बैठक खत्म हुई और मीडिया ने उनसे जनता के मुद्दों पर जवाब मांगा, तो वे कैमरे से बचते नजर आए और बिना कुछ कहे दफ्तर से निकल गए।

एक जनपद CEO पंचायती राज व्यवस्था का प्रशासनिक प्रमुख होता है, जिसकी जिम्मेदारी ब्लॉक के विकास कार्यों की निगरानी और समन्वय करना है। लेकिन जब एक जिम्मेदार अधिकारी ही इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना और रहस्यमयी रवैया अपनाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दाल में सिर्फ कुछ काला नहीं है, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है।


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