छत्तीसगढ़

जलवायु संकट की दस्तक: बदलते मौसम ने बढ़ाई जंगलों, किसानों और वन्यजीवों की चिंता, उदंती-सीतानदी में चला जागरूकता अभियान

गरियाबंद | 8 जुलाई। कभी भविष्य की चुनौती माना जाने वाला जलवायु परिवर्तन अब वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, आकाशीय बिजली, सूखते जलस्रोत और जंगलों में बढ़ती आग जैसी घटनाएं इस बदलाव की स्पष्ट चेतावनी दे रही हैं। इन्हीं गंभीर परिस्थितियों के बीच उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (USTR) ने कोयबा ईको सेंटर में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया, जहां विशेषज्ञों ने ग्रामीणों और वन आश्रित समुदायों को बदलते पर्यावरण के खतरों से अवगत कराया।

पहला चरण: वैज्ञानिकों ने बताया क्यों बढ़ रहा है खतराकार्यक्रम में जलवायु विशेषज्ञ नितिन सिंघवी ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। उन्होंने ‘वेट बल्ब तापमान’ की अवधारणा समझाते हुए बताया कि अत्यधिक गर्मी और नमी का मेल मानव शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रणाली को प्रभावित करता है। ऐसी स्थिति में शरीर स्वयं को ठंडा नहीं रख पाता, जिससे हीट स्ट्रोक और जानलेवा परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। खेतों में काम करने वाले किसान, मजदूर, वनकर्मी, बुजुर्ग और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं।

दूसरा चरण: बदलता मानसून बना नई मुसीबत विशेषज्ञों ने बताया कि छत्तीसगढ़ में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कभी कुछ घंटों में अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कभी लंबे समय तक बारिश नहीं होती। इसका असर भूजल स्तर, नदियों, जंगलों और खेती पर एक साथ दिखाई दे रहा है। आकाशीय बिजली, अचानक बाढ़ और जंगलों में आग की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

तीसरा चरण: किसानों पर सबसे बड़ा असर कार्यक्रम में बताया गया कि वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन ही है। अनियमित वर्षा, बढ़ते तापमान और भूजल में गिरावट के कारण धान सहित अन्य फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। साथ ही कीट एवं रोगों का खतरा बढ़ने से खेती की लागत भी बढ़ेगी। विशेषज्ञों ने जल संरक्षण, मृदा संरक्षण और जलवायु अनुकूल खेती को समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया।

चौथा चरण: जंगल ही सबसे बड़ी सुरक्षा ढालकार्यक्रम में बताया गया कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व केवल वन्यजीवों का आश्रय स्थल नहीं, बल्कि जलवायु संतुलन बनाए रखने वाली प्राकृतिक प्रणाली भी है। यहां के वन कार्बन अवशोषित करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं, भूजल का पुनर्भरण करते हैं और हजारों जीव-जंतुओं व वनस्पतियों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं।

पांचवां चरण: वन्यजीव भी बदल रहे अपना व्यवहार छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य गौरव निहलानी ने कहा कि बढ़ते तापमान और सूखते जलस्रोतों के कारण वन्यजीव अपने पारंपरिक आवास छोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। इससे मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की आशंका भी बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जैव विविधता का संरक्षण ही जलवायु संरक्षण की मजबूत नींव है।

छठा चरण: ग्रामीणों ने लिया प्रकृति संरक्षण का संकल्पकार्यक्रम में आसपास के कई गांवों के जनप्रतिनिधि, ग्रामीण, वन विभाग के अधिकारी और ईको डेवलपमेंट समिति के सदस्य शामिल हुए। सभी ने कोयबा ईको सेंटर परिसर में पौधरोपण किया और वनों के संरक्षण के साथ जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सामूहिक प्रयास करने का संकल्प लिया।

निष्कर्ष: समाधान केवल सरकार नहीं, समाज भीकार्यक्रम के अंत में अधिकारियों ने स्पष्ट संदेश दिया कि जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए प्रत्येक नागरिक की भागीदारी जरूरी है। जंगलों की सुरक्षा, जल संरक्षण, स्थानीय प्रजातियों का वृक्षारोपण और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार ही आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी है।

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